श्री राम दरबार: श्री राम, माता सीता, लक्ष्मण जी और हनुमान जी
॥ श्री गणेशाय नमः ॥रविवार, 1 नवंबर 20262:33:58 PMIST
रामकृपासनातन भक्ति का संपूर्ण संग्रह
होम › स्तोत्र › सोमसुंदर स्तुति (सोमसुंदर अष्टकम्)

सोमसुंदर स्तुति (सोमसुंदर अष्टकम्)

भगवान शिव · स्तोत्र · स्कन्द पुराण, हालास्य माहात्म्य (इन्द्र कृत)

स्तोत्र

सोमसुंदर स्तुति (सोमसुंदर अष्टकम्)

भगवान शिव
रचना: स्कन्द पुराण, हालास्य माहात्म्य (इन्द्र कृत)
पन्ना पलटें →
सोमसुंदर स्तुति (सोमसुंदर अष्टकम्)

एकं ब्रह्माद्वितीयं च परिपूर्णं परापरम्।
इति यो गीयते वेदैस्तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥१॥

ज्ञातृज्ञानज्ञेयरूपं विश्वं व्याप्य व्यवस्थितम्।
स्वयं सर्वैरदृश्यो यस्तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥२॥

अश्वमेधादियज्ञैश्च यः समाराध्यते द्विजैः।
ददाति च फलं तेषां तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥३॥

यं विदित्वा बुधाः सर्वे कर्मबन्धविवर्जिताः।
लभन्ते परमां मुक्तिं तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥४॥

देवदेवं यमाराध्य मृकण्डुतनयो मुनिः।
नित्यत्वमगमत्सद्यस्तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥५॥

पन्ना 1–2 / 6
पूरा पाठ एक पेज पर पढ़ें

एकं ब्रह्माद्वितीयं च परिपूर्णं परापरम्।
इति यो गीयते वेदैस्तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥१॥

ज्ञातृज्ञानज्ञेयरूपं विश्वं व्याप्य व्यवस्थितम्।
स्वयं सर्वैरदृश्यो यस्तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥२॥

अश्वमेधादियज्ञैश्च यः समाराध्यते द्विजैः।
ददाति च फलं तेषां तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥३॥

यं विदित्वा बुधाः सर्वे कर्मबन्धविवर्जिताः।
लभन्ते परमां मुक्तिं तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥४॥

देवदेवं यमाराध्य मृकण्डुतनयो मुनिः।
नित्यत्वमगमत्सद्यस्तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥५॥

निजनेत्राम्बुजकृतं पूजया परितोष्य यम्।
श्रीपतिर्लभते चक्रं तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥६॥

येन सृष्टं जगत्सर्वं रक्षितं संहृतं क्रमात्।
सत्यं विज्ञानमानन्दं तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥७॥

यस्मै वेदाश्च चत्वारो नमस्यन्ति वपुर्धराः।
ईशानं सर्वविद्यानां तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥८॥

यस्मात्परं चापरं च किञ्चिद्वस्तु न विद्यते।
ईश्वरं सर्वभूतानां तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥९॥

यस्य प्रणाममात्रेण सन्ति सर्वाश्च सम्पदः।
सर्वसिद्धिप्रदं शम्भुं तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥१०॥

यस्य दर्शनमात्रेण ब्रह्महत्यादिपातकम्।
अवश्यं नश्यति क्षिप्रं तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥११॥

उत्तमाङ्गं च चरणं ब्रह्मणा विष्णुनापि च।
न दृश्यते यस्य यत्नात्तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥१२॥

त्वया नीपारण्यनाथ त्वदन्यान्
समानाहुर्दैवतान् पापिनस्ते।
तदा शम्भो त्वत्समं दैवतं स्याद्
यदा योगो वाजिनो रासभस्य ॥१३॥

अणोरणुस्त्वं महतो महांस्त्वं
सर्वात्मभावात्परिपूर्ण एकः।
त्वयैव शम्भो महिमा त्वदीयो
विज्ञायते वक्तुमिमं क्षमः कः ॥१४॥

॥इति श्रीस्कान्दे महापुराणे अगस्त्यसंहितायां हालास्यमाहात्म्ये इन्द्रकृता श्रीसोमसुन्दरस्तुतिः सम्पूर्णा॥

🔤 Read in English (Roman lyrics)

ekam brahmadvitiyam cha paripurnam paraparam|
iti yo giyate vedaistam vande somasundaram ||1||

gyatrigyanagyeyarupam vishvam vyapya vyavasthitam|
svayam sarvairadrishyo yastam vande somasundaram ||2||

ashvamedhadiyagyaishcha yah samaradhyate dvijaih|
dadati cha phalam tesham tam vande somasundaram ||3||

yam viditva budhah sarve karmabandhavivarjitah|
labhante paramam muktim tam vande somasundaram ||4||

devadevam yamaradhya mrikandutanayo munih|
nityatvamagamatsadyastam vande somasundaram ||5||

nijanetrambujakritam pujaya paritoshya yam|
shripatirlabhate chakram tam vande somasundaram ||6||

yena srishtam jagatsarvam rakshitam sanhritam kramat|
satyam vigyanamanandam tam vande somasundaram ||7||

yasmai vedashcha chatvaro namasyanti vapurdharah|
ishanam sarvavidyanam tam vande somasundaram ||8||

yasmatparam chaparam cha kinchidvastu na vidyate|
ishvaram sarvabhutanam tam vande somasundaram ||9||

yasya pranamamatrena santi sarvashcha sampadah|
sarvasiddhipradam shambhum tam vande somasundaram ||10||

yasya darshanamatrena brahmahatyadipatakam|
avashyam nashyati kshipram tam vande somasundaram ||11||

uttamangam cha charanam brahmana vishnunapi cha|
na drishyate yasya yatnattam vande somasundaram ||12||

tvaya niparanyanatha tvadanyan
samanahurdaivatan papinaste|
tada shambho tvatsamam daivatam syad
yada yogo vajino rasabhasya ||13||

anoranustvam mahato mahanstvam
sarvatmabhavatparipurna ekah|
tvayaiva shambho mahima tvadiyo
vigyayate vaktumimam kshamah kah ||14||

||iti shriskande mahapurane agastyasanhitayam halasyamahatmye indrakrita shrisomasundarastutih sampurna||

यह पाठ देवनागरी से अपने आप रोमन अक्षरों में बदला गया है। सही उच्चारण के लिए देवनागरी पाठ को आधार मानें।

परिचय

मदुरै के हालास्य क्षेत्र में विराजमान भगवान शिव के सोमसुंदर रूप की इन्द्र द्वारा की गई स्तुति। हर श्लोक "तं वन्दे सोमसुन्दरम्" पर समाप्त होता है। इसे सोमसुंदर अष्टकम् भी कहते हैं।

महत्व

सोमवार और प्रदोष पर शिव भक्त इसका पाठ करते हैं।

पाठ विधि

  1. स्नान करके साफ़ वस्त्र पहनें और भगवान शिव के चित्र या मूर्ति के सामने बैठें।
  2. घी का दीपक और धूप जलाएँ, फूल और भोग अर्पित करें।
  3. पहले श्री गणेश का स्मरण करें, फिर शांत मन से, स्पष्ट उच्चारण के साथ पूरा पाठ करें।
  4. पाठ के बाद भगवान शिव का मंत्र या आरती करके प्रसाद बाँटें।
  5. सोमवार को इस पाठ का विशेष महत्व माना जाता है; चाहें तो 11, 21 या 40 दिन का संकल्प लेकर रोज़ पढ़ें।