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वरूथिनी एकादशी व्रत कथा

अगली वरूथिनी एकादशी: 2 मई 2027 (रविवार) को, दिल्ली के समय से। पारण 3 मई को 5:39 AM से 8:18 AM के बीच। सभी एकादशी →

भगवान विष्णु · व्रत कथा · पौराणिक कथा (रामकृपा द्वारा सरल हिंदी सार)

व्रत कथा

वरूथिनी एकादशी व्रत कथा

भगवान विष्णु
रचना: पौराणिक कथा (रामकृपा द्वारा सरल हिंदी सार)
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वरूथिनी एकादशी व्रत कथा
वरूथिनी एकादशी व्रत कथा

नर्मदा के किनारे राजा मांधाता तपस्या कर रहे थे। तभी एक भालू ने आकर उनका पैर पकड़ लिया और उन्हें घसीटने लगा, पर राजा ने अपना ध्यान नहीं छोड़ा और भगवान को पुकारा।

भगवान विष्णु ने प्रकट होकर भालू से राजा की रक्षा की, पर तब तक राजा का पैर घायल हो चुका था।

भगवान ने उन्हें मथुरा जाकर वैशाख कृष्ण एकादशी, यानी वरूथिनी एकादशी का व्रत करने को कहा। राजा ने श्रद्धा से व्रत किया।

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वरूथिनी एकादशी व्रत कथा नर्मदा के किनारे राजा मांधाता तपस्या कर रहे थे। तभी एक भालू ने आकर उनका पैर पकड़ लिया और उन्हें घसीटने लगा, पर राजा ने अपना ध्यान नहीं छोड़ा और भगवान को पुकारा।

भगवान विष्णु ने प्रकट होकर भालू से राजा की रक्षा की, पर तब तक राजा का पैर घायल हो चुका था।

भगवान ने उन्हें मथुरा जाकर वैशाख कृष्ण एकादशी, यानी वरूथिनी एकादशी का व्रत करने को कहा। राजा ने श्रद्धा से व्रत किया।

व्रत के प्रभाव से उनका शरीर फिर स्वस्थ हो गया। वरूथिनी का अर्थ है रक्षा करने वाली।

व्रत की सामान्य विधि दशमी की रात हल्का सात्त्विक भोजन करें और एकादशी की सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लें। भगवान विष्णु को पीले फूल, तुलसी, धूप-दीप और फल अर्पित करके कथा सुनें या पढ़ें। दिन भर अन्न न खाएँ; स्वास्थ्य के अनुसार फल, दूध या केवल जल लें। रात को भजन-कीर्तन करें। अगले दिन द्वादशी को पारण के समय में ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन-दान देकर व्रत खोलें।

परिचय

वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी, वरूथिनी एकादशी की कथा और व्रत विधि, सरल हिंदी में।

महत्व

पारंपरिक मान्यता के अनुसार इस व्रत और कथा से पापों का नाश और भगवान विष्णु की कृपा मिलती है।

सवाल-जवाब

वरूथिनी एकादशी कब है?

2 मई 2027 (रविवार) को, दिल्ली के समय से। पारण 3 मई को 5:39 AM से 8:18 AM के बीच।

एकादशी के व्रत में क्या खा सकते हैं?

परंपरा में एकादशी पर चावल और अनाज नहीं खाए जाते। फल, दूध, दही, साबूदाना, कुट्टू, सिंघाड़ा, आलू और सेंधा नमक लिया जा सकता है। निर्जला व्रत में जल भी नहीं लिया जाता। स्वास्थ्य ठीक न हो तो अपनी क्षमता के अनुसार व्रत रखें।