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सत्यनारायण व्रत कथा

भगवान विष्णु · पाठ और कथा · स्कन्द पुराण, रेवा खण्ड (रामकृपा द्वारा सरल हिंदी सार)

पाठ और कथा

सत्यनारायण व्रत कथा

भगवान विष्णु
रचना: स्कन्द पुराण, रेवा खण्ड (रामकृपा द्वारा सरल हिंदी सार)
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सत्यनारायण व्रत कथा
कथा से पहले

यह स्कन्द पुराण के रेवा खण्ड में आने वाली श्री सत्यनारायण व्रत कथा का रामकृपा द्वारा सरल हिंदी में लिखा गया सार है।
पूजा में संकल्प, गणेश पूजन, कलश स्थापना और सत्यनारायण भगवान की पूजा के बाद यह कथा सुनी जाती है।
कथा पाँच अध्यायों में है। हर अध्याय के बाद शंख बजाकर "श्री सत्यनारायण भगवान की जय" बोलें।

पहला अध्याय

एक बार नैमिषारण्य तीर्थ में शौनक आदि अठासी हज़ार ऋषियों ने सूत जी से पूछा कि कलियुग में मनुष्य के दुख कैसे दूर हों।

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कथा से पहले

यह स्कन्द पुराण के रेवा खण्ड में आने वाली श्री सत्यनारायण व्रत कथा का रामकृपा द्वारा सरल हिंदी में लिखा गया सार है।
पूजा में संकल्प, गणेश पूजन, कलश स्थापना और सत्यनारायण भगवान की पूजा के बाद यह कथा सुनी जाती है।
कथा पाँच अध्यायों में है। हर अध्याय के बाद शंख बजाकर "श्री सत्यनारायण भगवान की जय" बोलें।

पहला अध्याय

एक बार नैमिषारण्य तीर्थ में शौनक आदि अठासी हज़ार ऋषियों ने सूत जी से पूछा कि कलियुग में मनुष्य के दुख कैसे दूर हों।
सूत जी ने बताया कि यही प्रश्न एक बार नारद जी ने भगवान विष्णु से पूछा था।
नारद जी पृथ्वी पर घूमते हुए मनुष्यों को अनेक दुखों से घिरा देखकर बहुत व्याकुल हुए और क्षीरसागर में भगवान के पास पहुँचे।
भगवान ने कहा कि सत्यनारायण का व्रत करने से मनुष्य को इस लोक में सुख और परलोक में मोक्ष मिलता है।
यह व्रत किसी भी दिन, विशेषकर पूर्णिमा, संक्रांति या किसी शुभ अवसर पर, शाम को परिवार और मित्रों के साथ श्रद्धा से किया जा सकता है।
प्रसाद में केले, घी, दूध, गेहूँ का आटा (या सूजी) और शक्कर सवाया मात्रा में लेकर भोग बनाया जाता है।

दूसरा अध्याय

काशी नगरी में एक बहुत गरीब ब्राह्मण भिक्षा माँगकर जीवन चलाता था।
भगवान स्वयं एक बूढ़े ब्राह्मण के रूप में उसके पास आए और उसे सत्यनारायण व्रत की विधि बताई।
ब्राह्मण ने अगले दिन व्रत करने का संकल्प लिया। उस दिन उसे भिक्षा में बहुत धन मिला और उसने विधि से पूजा की।
व्रत के प्रभाव से उसकी गरीबी दूर हो गई और वह हर महीने यह व्रत करने लगा।
एक दिन एक लकड़हारा प्यासा होकर उसके घर आया, उसने पूजा देखी और विधि पूछी।
लकड़हारे ने भी व्रत का संकल्प लिया, उस दिन उसकी लकड़ियाँ दुगुने दाम में बिकीं, और उसने भी परिवार के साथ पूजा की।
उसे भी धन, संतान और सुख मिला, और अंत में वह भगवान के धाम को गया।

तीसरा अध्याय

उल्कामुख नाम के एक धर्मात्मा राजा अपनी रानी के साथ नदी किनारे सत्यनारायण की पूजा कर रहे थे।
उसी समय साधु नाम का एक व्यापारी नाव लेकर वहाँ रुका और राजा से व्रत का महत्व सुना।
व्यापारी को संतान नहीं थी। उसने संकल्प लिया कि संतान होने पर वह व्रत करेगा।
कुछ समय बाद उसके घर कलावती नाम की कन्या हुई, पर व्यापारी ने व्रत टाल दिया और कहा कि बेटी के विवाह पर करेगा।
बेटी का विवाह हुआ, पर व्यापारी फिर भूल गया। तब भगवान ने उसे सीख देने का निश्चय किया।
व्यापारी अपने दामाद के साथ व्यापार के लिए रत्नसारपुर गया, जहाँ राजा चन्द्रकेतु के यहाँ चोरी हुई थी।
भ्रम से दोनों पर चोरी का आरोप लगा और उन्हें कारागार में डाल दिया गया। उधर घर में भी चोरी हो गई और पत्नी और बेटी गरीबी में आ गईं।

चौथा अध्याय

एक दिन भूखी कलावती ने एक ब्राह्मण के घर सत्यनारायण की पूजा होते देखी और घर आकर माँ को बताया।
माँ लीलावती ने भगवान से क्षमा माँगी और व्रत किया। भगवान प्रसन्न हुए और राजा चन्द्रकेतु को सपने में सच बताया।
राजा ने ससुर और दामाद को छोड़ दिया और सम्मान से विदा किया।
रास्ते में भगवान एक साधु के रूप में आए और नाव में क्या है पूछा। व्यापारी ने घमंड से कहा कि नाव में तो बस बेल और पत्ते हैं।
उसी क्षण नाव का धन बेल-पत्तों में बदल गया। व्यापारी ने रोकर क्षमा माँगी, तब भगवान ने फिर से सब धन लौटा दिया।
घर के पास पहुँचने की खबर सुनकर कलावती पूजा का प्रसाद लिए बिना पति से मिलने दौड़ी। इससे दामाद की नाव डूबती दिखाई दी।
कलावती ने भूल समझी, लौटकर प्रसाद ग्रहण किया, और नाव फिर ठीक हो गई। तब से परिवार हर पूर्णिमा को श्रद्धा से व्रत करने लगा।

पाँचवाँ अध्याय

प्राचीन काल में तुंगध्वज नाम का एक राजा था। एक दिन वन में उसने ग्वालों को सत्यनारायण की पूजा करते देखा।
अहंकार के कारण राजा न पूजा में बैठा और न ही प्रसाद लिया।
घर लौटने पर उसका सारा राज-पाट और परिवार संकट में पड़ गया।
राजा को अपनी भूल समझ आई। वह लौटकर ग्वालों के बीच बैठा, पूजा में शामिल हुआ और श्रद्धा से प्रसाद लिया।
भगवान की कृपा से उसका सब कुछ लौट आया, और वह जीवन भर यह व्रत करता रहा।

कथा का सार

सत्यनारायण का अर्थ है सत्य ही नारायण है। सच्चाई, किया हुआ संकल्प निभाना और प्रसाद का आदर, यही इस कथा की सीख है।
कथा के बाद "जय लक्ष्मीरमणा" आरती करें, सब में प्रसाद बाँटें और स्वयं भी प्रसाद ग्रहण करें।

🔤 Read in English (Roman lyrics)

Katha Se Pahale

yah skanda puran ke reva khanda men ane vali shri satyanarayan vrat katha ka ramakripa dvara saral hindi men likha gaya sar hai|
puja men sankalpa, ganesh pujan, kalash sthapana aur satyanarayan bhagavan ki puja ke bad yah katha suni jati hai|
katha panch adhyayon men hai| har adhyay ke bad shankh bajakar "shri satyanarayan bhagavan ki jay" bolen|

Pahala Adhyay

ek bar naimisharanya tirtha men shaunak adi athasi hazar rishiyon ne sut ji se puchha ki kaliyug men manushya ke dukh kaise dur hon|
sut ji ne bataya ki yahi prashna ek bar narad ji ne bhagavan vishnu se puchha tha|
narad ji prithvi par ghumate hue manushyon ko anek dukhon se ghira dekhakar bahut vyakul hue aur kshirasagar men bhagavan ke pas pahunche|
bhagavan ne kaha ki satyanarayan ka vrat karane se manushya ko is lok men sukh aur paralok men moksha milata hai|
yah vrat kisi bhi din, visheshakar purnima, sankranti ya kisi shubh avasar par, sham ko parivar aur mitron ke sath shraddha se kiya ja sakata hai|
prasad men kele, ghi, dudh, gehun ka ata (ya suji) aur shakkar savaya matra men lekar bhog banaya jata hai|

Dusara Adhyay

kashi nagari men ek bahut garib brahman bhiksha mangakar jivan chalata tha|
bhagavan svayan ek burhe brahman ke rup men usake pas ae aur use satyanarayan vrat ki vidhi batai|
brahman ne agale din vrat karane ka sankalpa liya| us din use bhiksha men bahut dhan mila aur usane vidhi se puja ki|
vrat ke prabhav se usaki garibi dur ho gai aur vah har mahine yah vrat karane laga|
ek din ek lakarahara pyasa hokar usake ghar aya, usane puja dekhi aur vidhi puchhi|
lakarahare ne bhi vrat ka sankalpa liya, us din usaki lakariyan dugune dam men bikin, aur usane bhi parivar ke sath puja ki|
use bhi dhan, santan aur sukh mila, aur ant men vah bhagavan ke dham ko gaya|

Tisara Adhyay

ulkamukh nam ke ek dharmatma raja apani rani ke sath nadi kinare satyanarayan ki puja kar rahe the|
usi samay sadhu nam ka ek vyapari nav lekar vahan ruka aur raja se vrat ka mahatva suna|
vyapari ko santan nahin thi| usane sankalpa liya ki santan hone par vah vrat karega|
kuchh samay bad usake ghar kalavati nam ki kanya hui, par vyapari ne vrat tal diya aur kaha ki beti ke vivah par karega|
beti ka vivah hua, par vyapari phir bhul gaya| tab bhagavan ne use sikh dene ka nishchay kiya|
vyapari apane damad ke sath vyapar ke lie ratnasarapur gaya, jahan raja chandraketu ke yahan chori hui thi|
bhram se donon par chori ka arop laga aur unhen karagar men dal diya gaya| udhar ghar men bhi chori ho gai aur patni aur beti garibi men a gain|

Chautha Adhyay

ek din bhukhi kalavati ne ek brahman ke ghar satyanarayan ki puja hote dekhi aur ghar akar man ko bataya|
man lilavati ne bhagavan se kshama mangi aur vrat kiya| bhagavan prasanna hue aur raja chandraketu ko sapane men sach bataya|
raja ne sasur aur damad ko chhora diya aur samman se vida kiya|
raste men bhagavan ek sadhu ke rup men ae aur nav men kya hai puchha| vyapari ne ghamand se kaha ki nav men to bas bel aur patte hain|
usi kshan nav ka dhan bel-patton men badal gaya| vyapari ne rokar kshama mangi, tab bhagavan ne phir se sab dhan lauta diya|
ghar ke pas pahunchane ki khabar sunakar kalavati puja ka prasad lie bina pati se milane dauri| isase damad ki nav dubati dikhai di|
kalavati ne bhul samajhi, lautakar prasad grahan kiya, aur nav phir thik ho gai| tab se parivar har purnima ko shraddha se vrat karane laga|

Panchavan Adhyay

prachin kal men tungadhvaj nam ka ek raja tha| ek din van men usane gvalon ko satyanarayan ki puja karate dekha|
ahankar ke karan raja na puja men baitha aur na hi prasad liya|
ghar lautane par usaka sara raj-pat aur parivar sankat men para gaya|
raja ko apani bhul samajh ai| vah lautakar gvalon ke bich baitha, puja men shamil hua aur shraddha se prasad liya|
bhagavan ki kripa se usaka sab kuchh laut aya, aur vah jivan bhar yah vrat karata raha|

यह पाठ देवनागरी से अपने आप रोमन अक्षरों में बदला गया है। सही उच्चारण के लिए देवनागरी पाठ को आधार मानें।

परिचय

पूर्णिमा और शुभ अवसरों पर पढ़ी जाने वाली भगवान सत्यनारायण की पाँच अध्यायों की कथा, सरल हिंदी में।

महत्व

पूर्णिमा, गृह प्रवेश और मनोकामना पूरी होने पर।

पाठ विधि

  1. स्नान करके साफ़ वस्त्र पहनें और भगवान विष्णु के चित्र या मूर्ति के सामने बैठें।
  2. घी का दीपक और धूप जलाएँ, फूल और भोग अर्पित करें।
  3. पहले श्री गणेश का स्मरण करें, फिर शांत मन से, स्पष्ट उच्चारण के साथ पूरा पाठ करें।
  4. पाठ के बाद भगवान विष्णु का मंत्र या आरती करके प्रसाद बाँटें।
  5. गुरुवार को इस पाठ का विशेष महत्व माना जाता है; चाहें तो 11, 21 या 40 दिन का संकल्प लेकर रोज़ पढ़ें।

सवाल-जवाब

सत्यनारायण कथा कब करें?

पूर्णिमा, गृह प्रवेश, विवाह की वर्षगाँठ, नई नौकरी या किसी मनोकामना पूरी होने पर।

प्रसाद में क्या बनता है?

आटे या सूजी का पंजीरी जैसा प्रसाद, पंचामृत, केला और तुलसी दल।