श्री राम दरबार: श्री राम, माता सीता, लक्ष्मण जी और हनुमान जी
॥ श्री गणेशाय नमः ॥रविवार, 1 नवंबर 20262:33:59 PMIST
रामकृपासनातन भक्ति का संपूर्ण संग्रह
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हनुमान चालीसा

हनुमान जी · चालीसा · गोस्वामी तुलसीदास

चालीसा

हनुमान चालीसा

हनुमान जी
रचना: गोस्वामी तुलसीदास
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हनुमान चालीसा
दोहा

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥

चौपाई

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥१॥

राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥२॥

महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥३॥

कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥४॥

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दोहा श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥

चौपाई जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥१॥ राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥२॥ महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥३॥ कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥४॥ हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥५॥ संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन॥६॥ बिद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥७॥ प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥८॥ सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥९॥ भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचंद्र के काज सँवारे॥१०॥ लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥११॥ रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥१२॥ सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥१३॥ सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥१४॥ जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥१५॥ तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥१६॥ तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना॥१७॥ जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥१८॥ प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥१९॥ दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥२०॥ राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥२१॥ सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना॥२२॥ आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥२३॥ भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥२४॥ नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥२५॥ संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥२६॥ सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥२७॥ और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै॥२८॥ चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥२९॥ साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥३०॥ अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥३१॥ राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥३२॥ तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥३३॥ अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥३४॥ और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥३५॥ संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥३६॥ जै जै जै हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥३७॥ जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥३८॥ जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥३९॥ तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय मँह डेरा॥४०॥

दोहा पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥

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Doha

shriguru charan saroj raj, nij manu mukuru sudhari|
baranaun raghubar bimal jasu, jo dayaku phal chari||

buddhihin tanu janike, sumiraun pavan-kumar|
bal budhi bidya dehu mohin, harahu kales bikar||

Chaupai

jay hanuman gyan gun sagar| jay kapis tihun lok ujagar||1||
ram dut atulit bal dhama| anjani-putra pavanasut nama||2||
mahabir bikram bajarangi| kumati nivar sumati ke sangi||3||
kanchan baran biraj subesa| kanan kundal kunchit kesa||4||
hath bajra au dhvaja birajai| kandhe munj janeu sajai||5||
sankar suvan kesarinandan| tej pratap maha jag bandan||6||
bidyavan guni ati chatur| ram kaj karibe ko atur||7||
prabhu charitra sunibe ko rasiya| ram lakhan sita man basiya||8||
sukshma rup dhari siyahin dikhava| bikat rup dhari lank jarava||9||
bhim rup dhari asur sanhare| ramachandra ke kaj sanvare||10||
lay sajivan lakhan jiyaye| shriraghubir harashi ur laye||11||
raghupati kinhi bahut barai| tum mam priy bharatahi sam bhai||12||
sahas badan tumharo jas gavain| as kahi shripati kanth lagavain||13||
sanakadik brahmadi munisa| narad sarad sahit ahisa||14||
jam kuber digapal jahan te| kabi kobid kahi sake kahan te||15||
tum upakar sugrivahin kinha| ram milay raj pad dinha||16||
tumharo mantra bibhishan mana| lankesvar bhae sab jag jana||17||
jug sahasra jojan par bhanu| lilyo tahi madhur phal janu||18||
prabhu mudrika meli mukh mahin| jaladhi langhi gaye acharaj nahin||19||
durgam kaj jagat ke jete| sugam anugrah tumhare tete||20||
ram duare tum rakhavare| hot na agya binu paisare||21||
sab sukh lahai tumhari sarana| tum rachchhak kahu ko dar na||22||
apan tej samharo apai| tinon lok hank ten kanpai||23||
bhut pisach nikat nahin avai| mahabir jab nam sunavai||24||
nasai rog harai sab pira| japat nirantar hanumat bira||25||
sankat ten hanuman chhuravai| man kram bachan dhyan jo lavai||26||
sab par ram tapasvi raja| tin ke kaj sakal tum saja||27||
aur manorath jo koi lavai| soi amit jivan phal pavai||28||
charon jug paratap tumhara| hai parasiddha jagat ujiyara||29||
sadhu sant ke tum rakhavare| asur nikandan ram dulare||30||
ashta siddhi nau nidhi ke data| as bar din janaki mata||31||
ram rasayan tumhare pasa| sada raho raghupati ke dasa||32||
tumhare bhajan ram ko pavai| janam janam ke dukh bisaravai||33||
ant kal raghubar pur jai| jahan janma hari-bhakta kahai||34||
aur devata chitta na dharai| hanumat sei sarba sukh karai||35||
sankat katai mitai sab pira| jo sumirai hanumat balabira||36||
jai jai jai hanuman gosain| kripa karahu gurudev ki nain||37||
jo sat bar path kar koi| chhutahi bandi maha sukh hoi||38||
jo yah parhai hanuman chalisa| hoy siddhi sakhi gaurisa||39||
tulasidas sada hari chera| kijai nath hriday manh dera||40||

Doha

pavan tanay sankat haran, mangal murati rup|
ram lakhan sita sahit, hriday basahu sur bhup||

यह पाठ देवनागरी से अपने आप रोमन अक्षरों में बदला गया है। सही उच्चारण के लिए देवनागरी पाठ को आधार मानें।

परिचय

गोस्वामी तुलसीदास की रचना, जिसमें चालीस चौपाइयों में हनुमान जी के बल, बुद्धि और भक्ति का गुणगान है।

महत्व

मंगलवार और शनिवार को इसका पाठ विशेष माना जाता है। भक्त इसे डर और संकट के समय मन को बल देने के लिए पढ़ते हैं।

पाठ विधि

  1. स्नान करके साफ़ वस्त्र पहनें और हनुमान जी के चित्र या मूर्ति के सामने बैठें।
  2. घी का दीपक और धूप जलाएँ, फूल और भोग अर्पित करें।
  3. पहले श्री गणेश का स्मरण करें, फिर शांत मन से, स्पष्ट उच्चारण के साथ पूरा पाठ करें।
  4. पाठ के बाद हनुमान जी का मंत्र या आरती करके प्रसाद बाँटें।
  5. मंगलवार और शनिवार को इस पाठ का विशेष महत्व माना जाता है; चाहें तो 11, 21 या 40 दिन का संकल्प लेकर रोज़ पढ़ें।

सवाल-जवाब

हनुमान चालीसा कब पढ़नी चाहिए?

परंपरा में मंगलवार और शनिवार विशेष माने जाते हैं, पर इसे रोज़ सुबह या शाम कभी भी पढ़ा जा सकता है। स्नान करके, साफ़ जगह पर दीपक जलाकर पढ़ना अच्छा माना जाता है।

कितनी बार पाठ करें?

रोज़ एक बार पाठ काफ़ी है। कई भक्त संकल्प लेकर 7, 11 या 108 बार पाठ करते हैं, और कुछ लोग 40 दिन लगातार पाठ का नियम लेते हैं।

इसे किसने लिखा?

हनुमान चालीसा गोस्वामी तुलसीदास जी की रचना है। इसमें 40 चौपाइयाँ और शुरू-अंत में दोहे हैं।