श्री राम दरबार: श्री राम, माता सीता, लक्ष्मण जी और हनुमान जी
॥ श्री गणेशाय नमः ॥रविवार, 1 नवंबर 20262:34:25 PMIST
रामकृपासनातन भक्ति का संपूर्ण संग्रह
होम › पाठ और कथा › गीता के प्रसिद्ध श्लोक: सरल अर्थ सहित

गीता के प्रसिद्ध श्लोक: सरल अर्थ सहित

श्री कृष्ण · पाठ और कथा · श्रीमद्भगवद्गीता (महाभारत); अर्थ: रामकृपा

पाठ और कथा

गीता के प्रसिद्ध श्लोक: सरल अर्थ सहित

श्री कृष्ण
रचना: श्रीमद्भगवद्गीता (महाभारत); अर्थ: रामकृपा
पन्ना पलटें →
गीता के प्रसिद्ध श्लोक: सरल अर्थ सहित
श्रीमद्भगवद्गीता: प्रसिद्ध श्लोक और सरल सार

नीचे गीता के कुछ सबसे प्रसिद्ध श्लोक हैं। हर श्लोक के नीचे उसका सरल अर्थ रामकृपा ने अपने शब्दों में लिखा है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ (२.४७)

अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल में नहीं। फल की चिंता को कर्म का कारण मत बनाओ, और कर्म न करने में भी मन मत लगाओ।

पन्ना 1–2 / 11
पूरा पाठ एक पेज पर पढ़ें

श्रीमद्भगवद्गीता: प्रसिद्ध श्लोक और सरल सार नीचे गीता के कुछ सबसे प्रसिद्ध श्लोक हैं। हर श्लोक के नीचे उसका सरल अर्थ रामकृपा ने अपने शब्दों में लिखा है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ (२.४७)

अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल में नहीं। फल की चिंता को कर्म का कारण मत बनाओ, और कर्म न करने में भी मन मत लगाओ।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ (४.७)

अर्थ: जब-जब धर्म कमज़ोर होता है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं (भगवान) स्वयं प्रकट होता हूँ।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ (४.८)

अर्थ: सज्जनों की रक्षा, बुराई के नाश और धर्म की फिर से स्थापना के लिए मैं हर युग में आता हूँ।

न जायते म्रियते वा कदाचि-
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ (२.२०)

अर्थ: आत्मा न कभी जन्म लेती है, न मरती है। वह अजन्मी, नित्य और सनातन है; शरीर के नष्ट होने पर भी वह नष्ट नहीं होती।

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥ (२.२२)

अर्थ: जैसे मनुष्य पुराने कपड़े छोड़कर नए पहन लेता है, वैसे ही आत्मा पुराना शरीर छोड़कर नया शरीर धारण करती है।

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥ (२.२३)

अर्थ: आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न आग जला सकती है, न पानी गीला कर सकता है, न हवा सुखा सकती है।

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥ (२.१४)

अर्थ: सर्दी-गर्मी और सुख-दुख आते-जाते रहते हैं; ये स्थायी नहीं हैं। इन्हें धैर्य से सहना सीखो।

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥ (२.६२)

अर्थ: विषयों के बारे में लगातार सोचने से उनसे लगाव होता है, लगाव से इच्छा, और इच्छा पूरी न होने पर क्रोध पैदा होता है।

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥ (२.६३)

अर्थ: क्रोध से मोह (भ्रम), भ्रम से याददाश्त में गड़बड़ी, उससे बुद्धि का नाश, और बुद्धि नष्ट होने से मनुष्य का पतन होता है।

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (३.२१)

अर्थ: श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा आचरण करता है, बाकी लोग भी वैसा ही करते हैं। वह जो उदाहरण रखता है, दुनिया उसी पर चलती है।

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥ (६.५)

अर्थ: अपना उद्धार स्वयं करो, अपने को गिरने मत दो। मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु।

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥ (४.३९)

अर्थ: श्रद्धा रखने वाला, लगन वाला और इंद्रियों पर संयम रखने वाला ज्ञान पाता है, और ज्ञान से जल्दी ही परम शांति पाता है।

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ (९.२२)

अर्थ: जो लोग पूरे मन से मेरा ध्यान करते हैं, उनकी ज़रूरतें पूरी करना और जो उनके पास है उसकी रक्षा करना मेरी ज़िम्मेदारी है।

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥ (९.२६)

अर्थ: जो प्रेम से मुझे एक पत्ता, फूल, फल या थोड़ा-सा जल भी अर्पित करता है, मैं उस भक्ति भरी भेंट को स्वीकार करता हूँ।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ (१८.६६)

अर्थ: सब कुछ छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ; मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा, चिंता मत करो।

परिचय

श्रीमद्भगवद्गीता के 15 सबसे प्रसिद्ध श्लोक, हर श्लोक का सरल हिंदी अर्थ।

महत्व

गीता जयंती, एकादशी और रोज़ के स्वाध्याय के लिए।

पाठ विधि

  1. स्नान करके साफ़ वस्त्र पहनें और श्री कृष्ण के चित्र या मूर्ति के सामने बैठें।
  2. घी का दीपक और धूप जलाएँ, फूल और भोग अर्पित करें।
  3. पहले श्री गणेश का स्मरण करें, फिर शांत मन से, स्पष्ट उच्चारण के साथ पूरा पाठ करें।
  4. पाठ के बाद श्री कृष्ण का मंत्र या आरती करके प्रसाद बाँटें।
  5. बुधवार को इस पाठ का विशेष महत्व माना जाता है; चाहें तो 11, 21 या 40 दिन का संकल्प लेकर रोज़ पढ़ें।