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॥ श्री गणेशाय नमः ॥रविवार, 1 नवंबर 20262:34:01 PMIST
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सरस्वती चालीसा

माँ सरस्वती · चालीसा · रामसागर (चालीसा में नाम)

चालीसा

सरस्वती चालीसा

माँ सरस्वती
रचना: रामसागर (चालीसा में नाम)
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सरस्वती चालीसा
दोहा

जनक जननि पद कमल रज, निज मस्तक पर धारि।
बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि॥

पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमा अमित अनंतु।
रामसागर के पाप को, मातु तुही अब हन्तु॥

चौपाई

जय श्री सकल बुद्धि बलरासी। जय सर्वज्ञ अमर अविनासी॥

जय जय जय वीणाकर धारी। करती सदा सुहंस सवारी॥

रूप चतुर्भुजधारी माता। सकल विश्व अन्दर विख्याता॥

जग में पाप बुद्धि जब होती। जबहि धर्म की फीकी ज्योती॥

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दोहा

जनक जननि पद कमल रज, निज मस्तक पर धारि।
बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि॥

पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमा अमित अनंतु।
रामसागर के पाप को, मातु तुही अब हन्तु॥

चौपाई

जय श्री सकल बुद्धि बलरासी। जय सर्वज्ञ अमर अविनासी॥
जय जय जय वीणाकर धारी। करती सदा सुहंस सवारी॥
रूप चतुर्भुजधारी माता। सकल विश्व अन्दर विख्याता॥
जग में पाप बुद्धि जब होती। जबहि धर्म की फीकी ज्योती॥
तबहि मातु ले निज अवतारा। पाप हीन करती महि तारा॥
बाल्मीकि जी थे ब्रह्म ज्ञानी। तव प्रसाद जानै संसारा॥
रामायण जो रचे बनाई। आदि कवि की पदवी पाई॥
कालिदास जो भये विख्याता। तेरी कृपा दृष्टि से माता॥
तुलसी सूर आदि विद्वाना। भये और जो ज्ञानी नाना॥
तिन्हहिं न और रहेउ अवलम्बा। केवल कृपा आपकी अम्बा॥
करहु कृपा सोइ मातु भवानी। दुखित दीन निज दासहि जानी॥
पुत्र करै अपराध बहूता। तेहि न धरइ चित सुन्दर माता॥
राखु लाज जननी अब मेरी। विनय करूं बहु भांति घनेरी॥
मैं अनाथ तेरी अवलंबा। कृपा करउ जय जय जगदंबा॥
मधु कैटभ जो अति बलवाना। बाहुयुद्ध विष्णु ते ठाना॥
समर हजार पांच में घोरा। फिर भी मुख उनसे नहिं मोरा॥
मातु सहाय भई तेहि काला। बुद्धि विपरीत करी खलहाला॥
तेहि ते मृत्यु भई खल केरी। पुरवहु मातु मनोरथ मेरी॥
चंड मुण्ड जो थे विख्याता। छण महुं संहारेउ तेहि माता॥
रक्तबीज से समरथ पापी। सुर-मुनि हृदय धरा सब कांपी॥
काटेउ सिर जिम कदली खम्बा। बार बार बिनवउं जगदंबा॥
जग प्रसिद्ध जो शुंभ निशुंभा। छिन में बधे ताहि तू अम्बा॥
भरत-मातु बुधि फेरेउ जाई। रामचंद्र बनवास कराई॥
एहि विधि रावन वध तुम कीन्हा। सुर नर मुनि सब कहुं सुख दीन्हा॥
को समरथ तव यश गुन गाना। निगम अनादि अनंत बखाना॥
विष्णु रुद्र अज सकहिं न मारी। जिनकी हो तुम रक्षाकारी॥
रक्त दन्तिका और शताक्षी। नाम अपार है दानव भक्षी॥
दुर्गम काज धरा पर कीन्हा। दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा॥
दुर्ग आदि हरनी तू माता। कृपा करहु जब जब सुखदाता॥
नृप कोपित जो मारन चाहै। कानन में घेरे मृग नाहै॥
सागर मध्य पोत के भंगे। अति तूफान नहिं कोऊ संगे॥
भूत प्रेत बाधा या दुःख में। हो दरिद्र अथवा संकट में॥
नाम जपे मंगल सब होई। संशय इसमें करइ न कोई॥
पुत्रहीन जो आतुर भाई। सबै छांड़ि पूजें एहि माई॥
करै पाठ नित यह चालीसा। होय पुत्र सुन्दर गुण ईसा॥
धूपादिक नैवेद्य चढ़ावै। संकट रहित अवश्य हो जावै॥
भक्ति मातु की करै हमेशा। निकट न आवै ताहि कलेशा॥
बंदी पाठ करें शत बारा। बंदी पाश दूर हो सारा॥
करहु कृपा भवमुक्ति भवानी। मो कहं दास सदा निज जानी॥

दोहा

माता सूरज कान्ति तव, अंधकार मम रूप।
डूबन ते रक्षा करहु, परूं न मैं भव-कूप॥

बल बुद्धि विद्या देहु मोहि, सुनहु सरस्वति मातु।
अधम रामसागरहिं तुम, आश्रय देउ पुनातु॥

🔤 Read in English (Roman lyrics)

Doha

janak janani pad kamal raj, nij mastak par dhari|
bandaun matu sarasvati, buddhi bal de datari||

purna jagat men vyapta tav, mahima amit anantu|
ramasagar ke pap ko, matu tuhi ab hantu||

Chaupai

jay shri sakal buddhi balarasi| jay sarvagya amar avinasi||
jay jay jay vinakar dhari| karati sada suhans savari||
rup chaturbhujadhari mata| sakal vishva andar vikhyata||
jag men pap buddhi jab hoti| jabahi dharma ki phiki jyoti||
tabahi matu le nij avatara| pap hin karati mahi tara||
balmiki ji the brahma gyani| tav prasad janai sansara||
ramayan jo rache banai| adi kavi ki padavi pai||
kalidas jo bhaye vikhyata| teri kripa drishti se mata||
tulasi sur adi vidvana| bhaye aur jo gyani nana||
tinhahin na aur raheu avalamba| keval kripa apaki amba||
karahu kripa soi matu bhavani| dukhit din nij dasahi jani||
putra karai aparadh bahuta| tehi na dharai chit sundar mata||
rakhu laj janani ab meri| vinay karun bahu bhanti ghaneri||
main anath teri avalamba| kripa karau jay jay jagadamba||
madhu kaitabh jo ati balavana| bahuyuddha vishnu te thana||
samar hajar panch men ghora| phir bhi mukh unase nahin mora||
matu sahay bhai tehi kala| buddhi viparit kari khalahala||
tehi te mrityu bhai khal keri| puravahu matu manorath meri||
chand munda jo the vikhyata| chhan mahun sanhareu tehi mata||
raktabij se samarath papi| sur-muni hriday dhara sab kampi||
kateu sir jim kadali khamba| bar bar binavaun jagadamba||
jag prasiddha jo shumbh nishumbha| chhin men badhe tahi tu amba||
bharat-matu budhi phereu jai| ramachandra banavas karai||
ehi vidhi ravan vadh tum kinha| sur nar muni sab kahun sukh dinha||
ko samarath tav yash gun gana| nigam anadi anant bakhana||
vishnu rudra aj sakahin na mari| jinaki ho tum rakshakari||
rakta dantika aur shatakshi| nam apar hai danav bhakshi||
durgam kaj dhara par kinha| durga nam sakal jag linha||
durga adi harani tu mata| kripa karahu jab jab sukhadata||
nrip kopit jo maran chahai| kanan men ghere mrig nahai||
sagar madhya pot ke bhange| ati tuphan nahin kou sange||
bhut pret badha ya duhkh men| ho daridra athava sankat men||
nam jape mangal sab hoi| sanshay isamen karai na koi||
putrahin jo atur bhai| sabai chhanri pujen ehi mai||
karai path nit yah chalisa| hoy putra sundar gun isa||
dhupadik naivedya charhavai| sankat rahit avashya ho javai||
bhakti matu ki karai hamesha| nikat na avai tahi kalesha||
bandi path karen shat bara| bandi pash dur ho sara||
karahu kripa bhavamukti bhavani| mo kahan das sada nij jani||

Doha

mata suraj kanti tav, andhakar mam rup|
duban te raksha karahu, parun na main bhav-kup||

bal buddhi vidya dehu mohi, sunahu sarasvati matu|
adham ramasagarahin tum, ashray deu punatu||

यह पाठ देवनागरी से अपने आप रोमन अक्षरों में बदला गया है। सही उच्चारण के लिए देवनागरी पाठ को आधार मानें।

परिचय

विद्या की देवी माँ सरस्वती की स्तुति।

महत्व

वसंत पंचमी और पढ़ाई शुरू करने से पहले इसका पाठ किया जाता है।

पाठ विधि

  1. स्नान करके साफ़ वस्त्र पहनें और माँ सरस्वती के चित्र या मूर्ति के सामने बैठें।
  2. घी का दीपक और धूप जलाएँ, फूल और भोग अर्पित करें।
  3. पहले श्री गणेश का स्मरण करें, फिर शांत मन से, स्पष्ट उच्चारण के साथ पूरा पाठ करें।
  4. पाठ के बाद माँ सरस्वती का मंत्र या आरती करके प्रसाद बाँटें।
  5. बुधवार को इस पाठ का विशेष महत्व माना जाता है; चाहें तो 11, 21 या 40 दिन का संकल्प लेकर रोज़ पढ़ें।