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॥ श्री गणेशाय नमः ॥रविवार, 1 नवंबर 20262:34:01 PMIST
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शनि चालीसा

शनि देव · चालीसा · रामसुंदर (चालीसा में नाम)

चालीसा

शनि चालीसा

शनि देव
रचना: रामसुंदर (चालीसा में नाम)
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शनि चालीसा
दोहा

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल।
दीनन के दुःख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥

जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज।
करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥

चौपाई

जयति जयति शनिदेव दयाला। करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥

चारि भुजा, तनु श्याम विराजै। माथे रतन मुकुट छवि छाजै॥

परम विशाल मनोहर भाला। टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥

कुण्डल श्रवण चमाचम चमके। हिये माल मुक्तन मणि दमके॥

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दोहा

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल।
दीनन के दुःख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥

जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज।
करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥

चौपाई

जयति जयति शनिदेव दयाला। करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥
चारि भुजा, तनु श्याम विराजै। माथे रतन मुकुट छवि छाजै॥
परम विशाल मनोहर भाला। टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥
कुण्डल श्रवण चमाचम चमके। हिये माल मुक्तन मणि दमके॥
कर में गदा त्रिशूल कुठारा। पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥
पिंगल, कृष्णो, छाया, नन्दन। यम, कोणस्थ, रौद्र, दुःख भंजन॥
सौरी, मन्द, शनि, दशनामा। भानु पुत्र पूजहिं सब कामा॥
जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वै जाहीं। रंकहुं राव करैं क्षण माहीं॥
पर्वतहू तृण होई निहारत। तृणहू को पर्वत करि डारत॥
राज मिलत वन रामहिं दीन्हो। कैकेइहुं की मति हरि लीन्हो॥
बनहूं में मृग कपट दिखाई। मातु जानकी गई चुराई॥
लखनहिं शक्ति विकल करिडारा। मचिगा दल में हाहाकारा॥
रावण की गति मति बौराई। रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई॥
दियो कीट करि कंचन लंका। बजि बजरंग बीर की डंका॥
नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा। चित्र मयूर निगलि गै हारा॥
हार नौलाखा लाग्यो चोरी। हाथ पैर डरवायो तोरी॥
भारी दशा निकृष्ट दिखायो। तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो॥
विनय राग दीपक महँ कीन्हों। तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हों॥
हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी। आपहुं भरे डोम घर पानी॥
तैसे नल पर दशा सिरानी। भूंजी-मीन कूद गई पानी॥
श्री शंकरहि गह्यो जब जाई। पार्वती को सती कराई॥
तनिक विलोकत ही करि रीसा। नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा॥
पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी। बची द्रौपदी होति उघारी॥
कौरव के भी गति मति मारयो। युद्ध महाभारत करि डारयो॥
रवि कहं मुख महं धरि तत्काला। लेकर कूदि परयो पाताला॥
शेष देव-लखि विनती लाई। रवि को मुख ते दियो छुड़ाई॥
वाहन प्रभु के सात सुजाना। जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना॥
जम्बुक सिंह आदि नख धारी। सो फल ज्योतिष कहत पुकारी॥
गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं। हय ते सुख सम्पत्ति उपजावै॥
गर्दभ हानि करै बहु काजा। सिंह सिद्धकर राज समाजा॥
जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै। मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥
जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी। चोरी आदि होय डर भारी॥
तैसहि चारि चरण यह नामा। स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा॥
लौह चरण पर जब प्रभु आवैं। धन जन सम्पत्ति नष्ट करावै॥
समता ताम्र रजत शुभकारी। स्वर्ण सर्वसुख मंगल कारी॥
जो यह शनि चरित्र नित गावै। कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै॥
अद्भुत नाथ दिखावैं लीला। करैं शत्रु के नशि बलि ढीला॥
जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई। विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥
पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत। दीप दान दै बहु सुख पावत॥
कहत राम सुन्दर प्रभु दासा। शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा॥

दोहा

पाठ शनिश्चर देव को, कीन्हों विमल तैयार।
करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥

🔤 Read in English (Roman lyrics)

Doha

jay ganesh girija suvan, mangal karan kripal|
dinan ke duhkh dur kari, kijai nath nihal||

jay jay shri shanidev prabhu, sunahu vinay maharaj|
karahu kripa he ravi tanay, rakhahu jan ki laj||

Chaupai

jayati jayati shanidev dayala| karat sada bhaktan pratipala||
chari bhuja, tanu shyam virajai| mathe ratan mukut chhavi chhajai||
param vishal manohar bhala| terhi drishti bhrikuti vikarala||
kundal shravan chamacham chamake| hiye mal muktan mani damake||
kar men gada trishul kuthara| pal bich karain arihin sanhara||
pingal, krishno, chhaya, nandan| yam, konastha, raudra, duhkh bhanjan||
sauri, manda, shani, dashanama| bhanu putra pujahin sab kama||
ja par prabhu prasanna hvai jahin| rankahun rav karain kshan mahin||
parvatahu trin hoi niharat| trinahu ko parvat kari darat||
raj milat van ramahin dinho| kaikeihun ki mati hari linho||
banahun men mrig kapat dikhai| matu janaki gai churai||
lakhanahin shakti vikal karidara| machiga dal men hahakara||
ravan ki gati mati baurai| ramachandra son bair barhai||
diyo kit kari kanchan lanka| baji bajarang bir ki danka||
nrip vikram par tuhi pagu dhara| chitra mayur nigali gai hara||
har naulakha lagyo chori| hath pair daravayo tori||
bhari dasha nikrishta dikhayo| telihin ghar kolhu chalavayo||
vinay rag dipak mahan kinhon| tab prasanna prabhu hvai sukh dinhon||
harishchandra nrip nari bikani| apahun bhare dom ghar pani||
taise nal par dasha sirani| bhunji-min kud gai pani||
shri shankarahi gahyo jab jai| parvati ko sati karai||
tanik vilokat hi kari risa| nabh uri gayo gaurisut sisa||
pandav par bhai dasha tumhari| bachi draupadi hoti ughari||
kaurav ke bhi gati mati marayo| yuddha mahabharat kari darayo||
ravi kahan mukh mahan dhari tatkala| lekar kudi parayo patala||
shesh dev-lakhi vinati lai| ravi ko mukh te diyo chhurai||
vahan prabhu ke sat sujana| jag diggaj gardabh mrig svana||
jambuk sinh adi nakh dhari| so phal jyotish kahat pukari||
gaj vahan lakshmi grih avain| hay te sukh sampatti upajavai||
gardabh hani karai bahu kaja| sinh siddhakar raj samaja||
jambuk buddhi nashta kar darai| mrig de kashta pran sanharai||
jab avahin prabhu svan savari| chori adi hoy dar bhari||
taisahi chari charan yah nama| svarna lauh chandi aru tama||
lauh charan par jab prabhu avain| dhan jan sampatti nashta karavai||
samata tamra rajat shubhakari| svarna sarvasukh mangal kari||
jo yah shani charitra nit gavai| kabahun na dasha nikrishta satavai||
adbhut nath dikhavain lila| karain shatru ke nashi bali dhila||
jo pandit suyogya bulavai| vidhivat shani grah shanti karai||
pipal jal shani divas charhavat| dip dan dai bahu sukh pavat||
kahat ram sundar prabhu dasa| shani sumirat sukh hot prakasha||

Doha

path shanishchar dev ko, kinhon vimal taiyar|
karat path chalis din, ho bhavasagar par||

यह पाठ देवनागरी से अपने आप रोमन अक्षरों में बदला गया है। सही उच्चारण के लिए देवनागरी पाठ को आधार मानें।

परिचय

न्याय के देवता शनि देव की स्तुति।

महत्व

शनिवार को इसका पाठ किया जाता है।

पाठ विधि

  1. स्नान करके साफ़ वस्त्र पहनें और शनि देव के चित्र या मूर्ति के सामने बैठें।
  2. घी का दीपक और धूप जलाएँ, फूल और भोग अर्पित करें।
  3. पहले श्री गणेश का स्मरण करें, फिर शांत मन से, स्पष्ट उच्चारण के साथ पूरा पाठ करें।
  4. पाठ के बाद शनि देव का मंत्र या आरती करके प्रसाद बाँटें।
  5. चाहें तो 11, 21 या 40 दिन का संकल्प लेकर रोज़ पढ़ें।

सवाल-जवाब

शनि चालीसा कब पढ़ें?

शनिवार की शाम, और साढ़ेसाती या ढैया के समय नियम से पढ़ने की परंपरा है।

साथ में क्या करें?

पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना और ज़रूरतमंदों की मदद करना शनि देव की प्रसन्नता के लिए अच्छा माना जाता है।

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